Friday, May 15, 2015

हिंदी लेखन के माहौल में स्त्री - अनामिका



हिंदी लेखन के माहौल में स्त्री होना।
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    -  हिंदी लेखन के वर्तमान माहौल में स्त्रियाँ स्वयं को कमजोर एवं असहाय स्थिति में पाती है। कुछ पत्रिकाओ में रचनाये छपवा कर और एक-दो गोष्टियो में हिसा लेने के उपरांत प्रायः  स्त्रियाँ  गायब हो जाती है। जो टिकती है उनकी संख्या नगण्य कही जा सकती है। क्या उसके लिए हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक और संपादक जिम्मेदार है, जिन्हे हम हिंदी के व्यापक  सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा  मान सकते है, या कोई अन्य कारण है ?


  यह बड़ा सवाल है ! स्त्री का शरीर उसके गले  का ढोल तो है ही , उसके शोषण का प्राइम साइट भी है। फिर भी, सार्वजानिक क्षेत्र में स्त्रियाँ तीन स्तरों पर सक्रिय है : (1) लेखन, कला और संस्कृति के अनुष्ठानों में। (2) अध्ययन  - अध्यापन और, (३)  राजनीतिक उदबोधन, सामाजिक जागरण के अभियानों में। फिर भी, प्रारंभ में हम अध्यापन में सक्रिय स्त्रियों  की बात करे, और साथ ही यह  भी देखें कि स्त्रियाँ  भी वक्त के सामान्य नियमो द्वारा  परिचालित होती है। कल और आज में फर्क जरुरी है। मसलन, निर्मला जैन, उषा प्रियंवदा, मंजु जैन, मैथली कौल, इन्दु जैन, आदि सीधे -सीधे विचार या व्यापक समाज के क्षेत्र में नही आ गई - ऐसा होता तो हम इस सन्दर्भ को गौरव और प्रसन्नता से याद करते। इन स्त्रियों  के पीछे या साथ बतौर संरक्षण पुरषो की भूमिका रही है। उनके पीछे पिता, भाई या मित्र या पति का संरक्षण था तो ये महिलाएँ  वहाँ पहुंची जहाँ हम उनके देखते है। इनके साथ आभिजात्य का एक घेरा भी बन गया। आप देखे तो यशपाल के उपन्यास 'झूठा सच' में भी जयदेव की स्थिति लगभग यही थी। लेकिन कहिए की साठ के दशक में अभिजात्य का यह घेरा टूटा।



- यह पुरानी बात हुई। आज क्या स्थिति है।



पहले जिन स्त्रियों  की बात मैंने की है उनके पास चयन की सुविधा नही थी। परिणामस्वरूप यदि उनके संरक्षण प्रगतिशील हुएं तो इसका फायदा उन्हें मिलता था, अन्यथा वे घुटती रहती थी। परन्तु बाद में जैसे स्त्रियों  ने पुरषो को अपनी रूचि अनुसार चुनना शुरू किया,स्थिति बदली। हलाकि स्थिति अब भी बहुत भी बदली है। आज जो लड़कियाँ लिखने पढ़ने से जुड़ती है, उनके लिए फ़िलहाल वातावरण बहुत अच्छा नही है। ऊपर मैने जिन-  जिन संरक्षकों  की भूमिका के विषय के बारे में कहा , वे अपने दौर के प्रगतिशील लोग थे। आज राज्याश्रय, धन्ना सेठों का संरक्षण पाकर नए प्रभावी पुरुष साहित्य में महंत की भूमिका निभा रहे है। वे विभिन पत्रिकाओं के  वरिष्ठ संपादक हो गए है। हिंदी में जो ए दिन ख़राब गोष्ठियाँ होती रहती है, वे इन्हीं  धन्ना सेठों और भ्रष्ट अफसरों के पैसों से होती हैं । इस माहौल में नई लेखिकाओं के प्रति  उनके उन्मुक्त  और उच्छृंखल व्यवहार  का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। इस अर्थ में यह वास्तव में न सिर्फ उन नई लेखिकाओं को हतोत्साहित करना हुआ , बल्कि एक  तरह से उन्हें खदेड़ना कहा जा सकता है। थोड़ा बहुत लिखने के बाद अगर लडकिया गायब हो जाती है , भाग जाती है या लिखती हुई नही दिखतीं तो इसका कारण यह है कि  इन्हे साहित्य के महंतो दवारा खदेड़ा गया है।


- क्या यह हिंदी की सामान्य  स्थिति है ? फिर, राज्याश्रय  या धन्ना सेठों से आपका तातपर्य क्या है।



   मै वर्ग शत्रु वाले विचार से बहुत सहमत नही हूँ , क्योकि भारत की भिन्न वस्तुस्थिति है। हिंदी में भी हर स्थान पर एक तरह की हालत नही है, यद्यपि समस्याऍ हर जगह बढ़ी है। दिल्ली की हालत तो और भी बुरी है। पटना इससे  बेहतर  है, वहाँ  महिला या स्त्री लेखिकाओं का सम्मान दिल्ली से अधिक है |. संस्कृति  कर्म से जुड़ी महिलाओं के पार्टी पुरषो में एक आदर या सम्मान का भाव है वहाँ। इस अर्थ में पटना अधिक विकसित, अधिक प्रगतिशील है। लेकिन  दिल्ली एकदम अलग है। एक नई लेखिका के लिए तो यह जगह और भी कठिन है। आए दिन हम यह सुनते है कि  फलां लेखिका की जो महत्वपूर्ण कृति है उसके पुरष सहकर्मी ने लिखा है, या सहकर्मी द्वारा  न लिखी जाकर वह किसी प्रसिद्ध पुरष लेखक  द्वारा  लिखी गई है। ये भी कहा जाता है  कि कथित लेखिका इस प्रसिद्ध लेखक के शयनकक्ष से होकर आई है। ऐसी बाते पब्लिक स्पेस में खुले आम सुनने को मिलती है। कही कोई संकोच नही , कही कोई संवेदनशीलता नही है। इस विकृत मानसिकता का क्या करे ?



- क्या  इस 'विकृति मानसिकता' का विरोध नही किया जा सकता ? क्या इसकी आलोचना नही की जानी चाहिए ?


    स्त्रीवादी आंदोलन के आने से चीजे कुछ बदली है। इस तरह से व्यक्ति के शोषण के खिलाफ नारीवादी सोच ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस आंदोलन ने यह बताया  कि समाज में घटित उक्त लड़ाई पूरे  स्त्री समाज की सामूहिक लड़ाई है जिसमे सबकी साझेदारी होनी चाहिए। संघ शक्ति का विकास नारीवादी आंदोलन ने किया है। संघ शक्ति बनाने की अवधारणा निश्चित रूप से मार्क्सवाद की ही अवधारणा है। फिर भी, स्त्रियों  को एकजुट होकर संघर्ष करने की ये चेतना नारीवादी आंदोलन के कारण ही संभव हो सकी। इस अर्थ  ने स्त्री देह की अवधारणा भी  बदल दी है। जहाँ एक ओर स्त्री की देह उसकी कमजोरी थी , वहाँ  अब इस आंदोलन ने इसका उसकी ताकत के रूप में प्रयोग सिखाया है। इस आंदोलन के माध्यम से स्त्रियों  ने अपनी देह को एक पूँजी के रूप में देखना शरू किया है। यद्यपि मै मानती हूँ  कि  यह भी एक किस्म का प्रतिक्रियावाद ही है, लेकिन प्रतिक्रिया व्यक्त करने की अपनी भूमिका होती है। जो स्वर पुरषो के व्यवहार  के विरुद्ध में उठ रहे है, उनका स्वागत होना चाहिए, उन्हें  प्रोत्साहन मिलना चाहिए।



- स्त्रियों के साथ होने वाले सुलूक को आपने स्वयं  देखा होगा। उसके आधार पर कुछ कहें।



लिखती हुई स्त्रियों  को कई बार पुरषो द्वारा शोषण के जाल में चालाकी से फंसाया जाता है। वे जिन वरिष्ठों का आदर करती है, जिन्हे पसंद करती है उन्ही की किसी व्यापक  योजना में फँस जाती है। पुरुष लेखक तमाम झांसे देकर स्त्री लेखको का शोषण करते है। मसलन, लेखक स्त्री रचनाकार को कहता है  कि  मेरे जीवन में बहुत परेशानियाँ है, मुझे आपकी हमदर्दी चाहिए। कोई कहता  है कि मेरा दांपत्य जीवन अव्यवस्थित  है। झूठ सच मिला कर जो तस्वीर पेश की जाती है वह काफी दहलाने वाली होती है। अनुभव के अभाव में और सामाजिक परिवेश की जानकारी न  होने से स्त्रियां यकीन  कर लेती है और उलझ जाती है। यह एक किस्म का षड्यंत्र है जो निरंतर चलता है। इस संदर्भ में सबसे जयादा शोषण मध्यवर्ग की स्त्रीयो का होता है, क्योकि ख़ास अर्थ में वे सबसे अधिक दबी है। स्त्रियां इन पुरुषो के प्रति आकर्षित होती है और धीरे धीरे इस आकर्षण को प्रेम समझने लगती है। लेकिन वास्तव ने यह प्रेम नही है। विडम्बना यह है कि जब तक वे इस भ्रम  को पहचानती है तब तक उनका इस्तेमाल हो चुका होता है। इससे उनका रचनात्मक विकास बाधित होता है। अधिकांश लेखिकाएं इस प्रक्रिया में मोहभंग की स्थिति में आती है और कलम छोड़ कर घर बैठ जातीं है। अधिक मूलगामी और मुस्किल पक्ष यह है कि स्त्री और पुरुष के बीच नर मादा वाले रिश्ते के परे भी कोई बौद्धिक और आत्मिक संबंध संभव है , यह पुरुषो की समझ के परे होता है। संभवतः  इसका संबंध पुरुष मानसिकता की संरचना से है। इस तरह स्त्री लेखको के सामाजिक या सांस्कृतिक दायरे में कोई सुरक्षित कोना नही बचता। जो है, वह केवल दैहिक संबंध है। अंग्रेेजी में एक कथन चलता था : 'आल रोड्स लीड टू रोम ' . स्त्रियों  के सन्दर्भ  ने इसे बदल कर कहा जा सकता है : ' आल रोड्स लीड टू रोम ' ! . यह स्थिति है, इससे कोई निस्तार नही है .!



-ऐसा क्यों कहती है ? ' निस्तार नही है ' का क्या मतलब ?



मतलब है। जितना दिखती है उनसे ज्यादा जटिल है चीजे। घर में रहे कर लिखने वाली स्त्रियों  के पास अन्य दिक्क़ते भी है। जयादातर स्त्रियां  नौकरी नही करती, करती भी है तो परिवार की बंदिशे उन पर हावी रहती है , जैसे उनके खिलाफ घेराबंदी की गई हो। उन्हें घर की पारम्परिक स्त्री-भूमिका के अतिरिकत भूमिकाए भी निभानी पड़ती है। उसके प्रति किसी की हमदर्दी नही रहती है। पुरुषो जैसे अधिकार, उनके जैसी सुविधाए पारम्परिक स्त्री को उपलब्ध नही है। उदाहरण के लिए, उन्हें अपने कागज छुपा कर संभाल कर रखने पड़ते है, ताकि उन्हें रद्दी के मोल बेच न दिया जाय। ट्रॉफिया बोरियो में या झोलों में छुपानी पड़ती है - माता, पिता या अन्य प्रियजनों की तस्वीरो के साथ। उन्हें कोई मिलने आया तो दिक्कत  पैदा हो जाती है, घर का कामकाज रुकता है और माहौल अटपटा लगने लगता है। स्त्रीयों का अपना जीवन क्या हो सकता है, यह हमारा सामाज नही समाज पाता। कहाँ-कहाँ लिखती है स्त्रियां ! बाथरूम में, किचन में। बस, यह गनीमत है की कलम में घुंघुरू नही लगे होते, शोर नही होता लिखने का। फिर लिखे हुए  को सुनाया किसे जाए ? पुरुष एक दूसरे से मिलते रहते है, एक दूसरे को राय से अवगत कराते रहते है। इस तरफ पुरुषो का लेखकीय विकास होता है। स्त्रियां कहाँ, किसे सुनाए ? अब जाकर लेखिका संघ जैसी संस्थाए सुगबुगा रही है ?



-यानी कोई समाधान नही है स्त्री होकर लिखने से जुडी समस्याओं का !



इसे सोचती हुँ तो लगता है की स्त्री लेखको का एक कम्युनिटी सेंटर होना चाहिए, जहाँ वे बेधड़क जा सके, उठ बैठ सके, लिख सके, ताकि प्राइवेट स्फियर में जाकर यौन शोषण न झेलना पड़े उन्हें। पुरुषो का नजरिया दिमाग में रखे तो असल में, स्त्री का शरीर ही उसके शोषण की आधारभूमि है। स्त्री सम्बन्धी सारे अपराधो का निवेदन वही होता  है - मारपीट, गाली -गलौच, यौन दोहन, ट्रैफिकिंग, वेश्यावृति , सती, पर्दा , डायन दहन , दहेज़ दहन , बलात्कार ,  संभोग प्रीतिहीन , भ्रूणहत्या  , साफ सुथरे , सुरक्षित प्रसव का अभाव। … ! इससे औरतों की लड़ाई संघन हो जाती है। स्त्रीयो का संघर्ष पुरुषो से ही कमतर नही बल्कि अतिरिक्त ही है। भूमंडलीकरण के खिलाफ संघर्ष है, विपन्नता का संकट उन्हें नही है। बाजार का, वयवसाय का, रोजी रोटी का , परिवार चलाने आदि का दबाव उन पर उतना ही है जितना पुरुषो पर। इसके अतिरिक्त देह को लेकर एक अतिरिक्त संघर्ष उन्हें झेलना पड़ता है।



-सामाजिक या परिवारगत हिंसा को आप क्या कहेंगी ?



मसलन, दंगो का सन्दर्भ ले। यह वास्तव में पुरुषो के बरगलाने की वजह से हुआ। पुरुषो ने सामाजिक मिथक गढ़े और किन्ही  हितो की पूर्ति के लिए धर्म , परम्परा , आदि अमानवीय और विकृत पक्षो का प्रचार किया। साथ ही पुरुषो ने झूठ की संस्कृति का बढ़ावा दिया। इसका शिकार औरतें हुई। दंगो के दौरान होने वाली हिंसा से औरतें अछूती कहा रहे पति है ? हलाकि बड़े पैमाने पर जो नृशंस हत्याए हुई, उनमे उनकी कोई भूमिका नही रही। इसकी तरफ सास की भूमिका को लेकर भी स्त्री पर आरोप लगते है। मेरी समझ से यह पितृसत्ता दवारा उत्पन असुरक्षा की वजह से है। जब तक यौवन है, औरत को तरजीह मिलती है। यौवन के ढ़लान पर असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। समय की साथ और बढ़ते दबावों के प्रभाव में सवय औरत पारिवारिक हिंसा में शामिल हो जाती है। औरतों को , और खास तौर पर स्त्री लेखिकाओं को इन प्रवर्तिया के मूल में जाना होगा और वह कारगर तत्वों की पड़ताल करनी होगी , ताकि पितृसत्ता का एजेंट न बनाई जाती रहे अशिक्षा/ कुशिक्षा की शिकार बुजुर्ग और अन्य स्त्रियां ।


-क्या विधाओं के चुनाव में स्त्री होने की भूमिका होती है ? मसलन , कुछ ऐसी चीजे है जहाँ स्त्रियां कलम चलाने से बचती है। कुछ ऐसी विधाएँ जिनसे बचा जाना आवश्यक लगता है। ऐसा है क्या ?



उपन्यास स्त्रियां कम लिखती है। वे प्राय : कविताए लिखती है . इसका बड़ा कारण कविता का फार्म है। कविता एक सांकेतिक या छोटी ,और किंचित अप्रत्यक्ष विधा है . अपने अनुभवों को बिंंबो और प्रतीकों के माध्यम  से स्त्रियां व्यक्त कर लेती है। सीधे व्यक्त करना उतना आसान  नही स्त्रियों के लिए। कविता एक फ़्लैश में आती है। दो और तीन बैठको में कविता पूरी हो जाती है। उंपन्यास लिखने की परिस्थितियां  भिन्न है। वह एक तरफ की लगातार और लंबी कोशिश चाहिए। स्त्रियों के पास सामाजिक अनुभवों से रूबरू होने के अवसर कम नही है, लेकिन उनकी भौतिक परिस्थितियां एकदम अलग है। समय की मुश्किल तो है ही , अनुभवों को तरतीब देने वाले विचार साक्षात व्यक्त हो तो सेंसर की कैंची भी तेज चलती है - कही राजनितिक, पारिवारिक -सांस्कृतिक सेंसर रंग दिखाते है तो कही आत्मसेंसर का 'नेक लड़की सिन्ड्रोम ' हाथ रोक लेता है कि आपबीती जगजाहिर कैसे करे, अपनो की कलई कैसे खोले। 'दुश्मन ' के भी बाल-बच्चे है, उन पर क्या बीतेगी, आदि दवंद उन्हें आत्मसंसेर का शिकार बनाते है।

-और लंबी कविताएँ ?



लंबी कविताएँ भी स्त्रियां कम लिखती है। यहां भी उपन्यास जैसी दिक्कत  है। लंबी कविताओं में मिथको का इस्तेमाल होता है। मिथको की नई व्याख्या होती है। व्याख्या का सीधा रिश्ता समकालीन समाज अथवा माहौल से होता है। इससे चीजें मूर्त होने लगती है और तरफ तरफ के द्व्न्द्व होने लगते है।



-स्त्रियों के लिए आलोचना में कितना हस्तक्षेप हो सकता है।?



एक तरह  से कहे तो आलोचना के लिए व्यक्तित्व  में जिस आत्मविश्वास की जरुरत होती है , उसका अभाव नारी लेखन में जरूर देखता है। बावजूद इसके मै यह नही मानती कि स्त्रियों  में आलोचकीय मेधा नही है। निर्मला जैन, अर्चना वर्मा , मृणाल पांडे, क्षमा शर्मा , रोहिणी अग्रवाल और हेमदत्ता माहेश्वर  के हस्तक्षेप से बहुत साकारात्मक उम्मीद बनी है। इस बात से जुड़ा एक दूसरा पहलु भी है। वह है संस्थानों के केन्द्रो में स्त्रियों  का न होना। एक स्त्री संस्थान में पहुँचती भी है तो पुरुष लेखको की सामूहिक सक्रियता से सामने असहाय हो जाती है। वह इस या  उस की पिछलग्गू बनने को मजबूर होती है। संस्थान में होने का अर्थ है पावर के निकट होना। स्त्रियों  की ताकत पुरुषो के लिए चुनौती बन सकती है और उन्हें आतंकित करती है। सांस्थानिक ढांचा टूटे या कमजोर हो तो संभवतः औरतो में कुछ आत्मविश्वास पैदा हो  . रचना की दुनिया में आलोचक लेखक का बड़ा भाई होता है। वह सही गलत का निर्णय करता है। और लेखक पर अधिकार जमता है। वर्तमान समय में सत्ता संस्थानों में सक्रिय लोगो का प्रामाणिक माना जा रहा है, यह दुर्भागयपूर्ण है। स्त्रियां इस क्षेत्र में पिछड़ रही है, यह सही है।



- स्त्रियों  से और विशेष रूप से युवा लेखिकाओं से बात करते समय पुरुष अनेक बार द्विअर्थी   वाक्यो और संवादों का इस्तेमाल करते है। क्या आपको  इसका अनुभव हुआ है?



निश्चित रूप से हुआ है। स्त्रियों   की रचनात्मक प्रतिभा को गंभीरता से नही लेने का प्रचलन है। जब कोई स्त्री कविता पढ़ने के लिए खड़ी होती है तो उसकी कविता के विषय में बात होने की बजाय उसके दैहिक आकर्षण , उसकी चाल, उसकी आवाज की तारीफ होती है। क्या इन चीजो से कविता का कोई रिश्ता है ? मातृत्व से आपूर्ण बड़ी उम्र की स्त्रियों  को जब यह सब सुनना पड़ता है तो नई लड़कियों की क्या स्थिति होगी , इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है. युवा लेखक तो फिर भी अदब और तमीज से पेश आते है, वरिष्ठों का वयवहार तो महंतो जैसा होता है। वह कहते है। -"अरे , तुम मिलती ही नही हो। इधर दिखाई नही देती। " क्यों मिले ? हमसे पहले जो  मिली, उनका क्या हश्र हुआ , यह वे हमे अच्छी तरह बता -समझा चुकी है ! स्त्रियाँ यह भी समझती है कि इन बातों का असली अर्थ क्या है। स्त्रियों  की छठी इंद्रिय बहुत सशक्त होती है। वे इन द्विअर्थी बातो की पेंच बहुत आसानी से समझ लेती है।



मेरा तो मानना है कि साहित्य में 'तीखी आलोचना ' अगम्भीर या झूठमूठ की प्रशंसा से बेहतर है, क्योकि 'तीखी आलोचना ' में कम अज कम विवेक तत्व का इस्तेमाल होता है, और एक निस्संगता होती है। पर आलोचना का आधार 'पाठ ' होना चाहिए। जो बात कही जा रही है - तर्कसम्मत ढंग से और परिष्कार की मंशा से की जानी चाहिए !



-लेखिका के साथ-साथ आप अध्यापन भी करतीं है और गोष्ठियों -बहसों में भी आपकी प्रभावी शिरकत होती है। इस प्रक्रिया में कुछ ऐसा देखने को मिला है जिसे आप युग परिबोध के पाठको से साझा करना चाहे ?



मै कभी-कभी डायरी भी लिखती हूँ जहॉ विशेष घटनाएँ और अनुभव दर्ज कर लेती हूँ. जो संवाद या टिप्पणी सुनती हूँ इन्हे इनवर्टेड कोमाज में लिखती हूँ। एक दो बार जब मै किसी पुरुष लेखक के साथ गोष्ठी में पहुँची तो वहाँ एकत्र लेखकों ने इसे दिलचस्पी से नोट किया। एकाध ने बाद में कोशिश की कि मै उनके साथ भी गोष्ठियों में जाऊ। जब यह न हुआ तो उन्हें बुरा लगा। कुछ ने अपने असंतोष का कमोबेश इजहार नही किया। स्त्री के व्यवहार का एक मामूली पक्ष व्यापक साहित्यिक दुनिया की गैरमामूली चिंता का विषय बना। यह घटना आज के नारी-विरोधी रवैये को साफ़ तौर पर सामने लाती है। इकबाल ने जो बात मनुष्य मात्र से कही थी, स्त्रीया पुरुषो से कहना चाहती  है : ' खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकबीर से पहले/खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है ?" खुदा और बंदे का रिश्ता नही जानती औरत , मगर यौनेतर, निरपेक्ष दोस्ती का रिश्ता तो चाहती है। पहले इस लायक तो हो जाइए की स्त्री आपके साथ आश्वस्त और सुरक्षित महसूस करे , उसे ऐसा लगे की वह 'मनुष्य ' के साथ जा रही है, 'मर्द' के साथ नही जो कभी भी उस पर झपट सकता है या उसके साथ लटपट बतिया सकता है। धीरे - धीरे यह स्थिति भी आएगी की वह आपको खुद फ़ोन करे ले : "गोष्ठी में चले ?"



-आज से लेखकीय और व्यापक सांस्कृतिक माहौल में नारी लेखिकाएँ काफी कुछ सहने को बाध्य है। इससे उनकी रचना किस तरफ प्रभावित होती है।



मुझे लगता है की सहिष्णुता  लड़ाई का पहला चरण है। जब कोई सह रहा होता है तो वह बह रहा होता है - तरफ -तरफ के भावो-विचारो में, जब्त  कर रहा होता है बाते, रणनीतियाँ गढ़ रहा होता है, प्रतिकार -शक्ति का संचयन कर रहा होता है। सहना लड़ाई का हिस्सा है। कलम दुनिया का सबसे पैना हथियार है . शब्दों के सहारे, शब्दों के माध्यम से माहौल में सक्रिय विचारो और मूल्यों पर टिप्पणी करना रचना का  आवश्यक कर्म है। स्त्रीयों  का लिखना वास्तव में इसी लड़ाई का, इसी कर्म का जरुरी हिस्सा है। आप देखिए कि  स्त्रियों   का जो लेखन है वह 'सवांदपरक' है। वहाँ परस्पर बहस और सवांद की बहुत संभावनाएं है। यह एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई है तो प्रुरुषो और पुरुषविशेष के विरुद्ध न समझ कर पितृसत्ता के खिलाफ समझना चाहिए।


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साभार युगपरिबोध पत्रिका



परिचय

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१७ अगस्त १९६१, मुजफ्फरपुर (बिहार)

दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए, पी.एचडी.
कविता संग्रह : गलत पते की चिट्ठी, बीजाक्षर, अनुष्टुप, समय के शहर में, खुरदुरी हथेलियाँ,डूब धान             .
आलोचना : पोस्ट -एलियट पोएट्री, स्त्रीत्व का मानचित्र , तिरियाचरित्रम, उत्तरकाण्ड, मन मांजने की जरुरत, पानी जो पत्थर पीता है .
शहरगाथा: एक ठो शहर, एक गो लड़की
कहानी संग्रह: प्रतिनायक
उपन्यास :अवांतरकथा, पर कौन सुनेगा, दस द्वारे का पिंजरा, तिनका तिनके पास
अनुवाद: नागमंडल (गिरीश कर्नाड), रिल्के की कवितायेँ , एफ्रो- इंग्लिश पोएम्स, अटलांट के आर-पार (समकालीन अंग्रेजी कविता), कहती हैं औरतें ( विश्व साहित्य की स्त्रीवादी कविताएँ )
सम्मान: भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, राष्ट्रभाषा  परिषद् पुरस्कार , गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार,
ऋतुराज सम्मान और  साहित्यकार सम्मान
सम्प्रति: अंग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

5 comments:

  1. आज के समय का कुलबुलाता सच जिसे परिवर्तन की महती आवश्यकता है

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  2. एक ज़रूरी आलेख

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  3. अनामिका जी की बेबाक़ी गजब की

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  4. अनामिका जी के साक्षात्कार में ईमानदारी से कई बातें कही गयीं हैं.बावजूद इसके कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे रह गए है.मसलन रचनाकार के लिए अपेक्षित धैर्य के अभाव में जल्दी से जल्दी सफलता की मंजिल (शोहरत,पुरस्कार,ऊँचा पद आदि) पाने के लिए कुछ लेखिकाएं स्थापित पुरुष लेखकों का बतौर सीढ़ी इस्तेमाल करने के कारण खुद मकड़जाल में फँस जाती हैं. दूसरी बात विधा को लेकर है.उपन्यास के क्षेत्र में स्त्री लेखन आज एक मुक़ाम हासिल कर चुका है.'पचपन खम्भे लाल दीवारें','माई','हमारा शहर उस बरस,'कलिकथा वाया बाईपास','मैं बोरिशाइल्ला','सेज पर संस्कृत' जैसे अनेक महत्वपूर्ण उपन्यासों के साथ ही खुद अनामिका रचित कई उपन्यासों के मद्देनज़र यह कहना कि 'उपन्यास स्त्रियाँ कम लिखती हैं'-शायद गैर वाजिब है.तीसरी बात है आलोचना के क्षेत्र में स्त्रियों के योगदान की.इस क्रम में निर्मला जैन से पूर्व 'युगचारण दिनकर' की लेखिका सावित्री सिन्हा और हमारे ज़माने में कवि-आलोचक कात्यायनी के अलावा शालिनी माथुर,गरिमा श्रीवास्तव की आलोचना में दमखम है.वस्तुत: आलोचना के क्षेत्र में काम करने के लिए रचनाकार से भी ज्यादा धीरज और मेहनत अपेक्षित है और इस विधा में लिखने वाले के दोस्त बहुत कम पर दुश्मन ज़रूर ज्यादा होते चले जाते हैं.लेखक तो लेखक आलोचक भी अपने सहधर्मियों से कई बार बेवजह चिढ़ते हैं. रचनाकारों के मुकाबले यश और पुरस्कार आदि भी बड़े से बड़े आलोचक को कम ही मिलते हैं.प्राय: साहत्य-क्षेत्र में इस बात को अनकहे ढंग से नकार दिया जाता है कि अच्छी रचना की तरह अच्छी आलोचना में भी सर्जनात्मकता होती है और वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उपन्यास,कहानी या कविता.शायद इस वजह से भी स्त्रियाँ आलोचना के क्षेत्र में कम सक्रिय हैं.

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